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जीना मरना यह मनुष्य के हाथ में नहीं होता। ये तो एक ऐसा सत्य है जिससे मनुष्य चाहे तो भी इंकार नहीं कर सकता है। जिसने भी इस धरती पर जन्म लिया है, उसे इस धरती को छोड़कर एक न एक दिन जाना होगा। कोई भी यहां अमर होकर नहीं आता है। ज़िंदगी की रीत ही यही है कि जीवन के बाद मृत्यु होनी ही है। जिस तरह जीवन के बाद मृत्यु का होना तय है, ठीक उसी तरह से मृत्यु के बाद मनुष्य को फिर से जीवन मिल जाता है। जीवन मृत्यु तो एक ही गाड़ी के दो पहिए के समान है। कभी जीवन आगे तो कभी मृत्यु आगे।

जिस तरह से मनुष्य का जन्म होता है तो काफी सारे रीति रिवाजों का पालन किया जाता है। ठीक उसी तरह से जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो भी बहुत सारे रीति रिवाजों का पालन किया जाता है। अगर इन रीति रिवाजों का पालन न किया जाए तो ऐसा माना जाता है कि मनुष्य की आत्मा को शांति नहीं मिलती है, आत्मा तृप्त नहीं होती है और भटकती रहती है। भटकती आत्मा लोगों को परेशान भी करती है। इसीलिए किसी के मरने के बाद उसका अंतिम संस्कार पूरे विधि विधान से अवश्य किया जाना चाहिए।

अलग-अलग धर्म में अंतिम संस्कार की अलग-अलग प्रक्रिया है और अलग-अलग मान्यता है। हिंदू धर्म में मृत शरीर को जलाने का प्रावधान है। जब मृत शरीर को जला दिया जाता है उसके बाद उसकी राख को गंगा में प्रवाहित किया जाता है। लेकिन क्या आप सभी यह जानते हैं कि आखिर क्यों अंतिम संस्कार हो जाने के बाद राख को गंगा में या फिर किसी नदी में प्रवाहित किया जाना आवश्यक होता है? आज इस लेख में हम आप सबको इसी के बारे में जानकारी देने जा रहे हैं।

अंतिम संस्कार के बाद राख को गंगा में क्यों प्रवाहित किया जाता है?

इसके पीछे एक मुख्य कारण है। दरअसल जब व्यक्ति के मृत शरीर को जला दिया जाता है, उसके बाद उसकी राख को समता लाने वाली चीज या फिर भेद मिटाने वाली चीज के तौर पर रखा जाता है। आप सभी अक्सर विभूति लगाते हैं। विभूति को भी शरीर के खास हिस्से पर लगाया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि इससे व्यक्ति के शरीर में संतुलन बना रहता है। विभूति का असल काम ही है संतुलन लाना। वहीं जो लोग साधना में लीन होते हैं या फिर कुछ अलग या खास तरह की साधना करते हैं, वो लोग जिस राख का इस्तेमाल करते हैं वो श्मशान की राख ही होती है। श्मशान की राख बहुत ज्यादा खास होती है।

श्मशान की जो राख होती है वो किसी लकड़ी के बचे हुए शेष नहीं होते हैं, बल्कि मृत शरीर के जल जाने के बाद बचे हुए अवशेष होते हैं। ऐसे में जब आप उसको अस्थियों के तौर पर कलश में संभालकर अपने घर में लाते हैं तो इससे आपका उससे लगाव बना रहता है। आप न चाहते हुए भी उस कलश के पास जाकर या कलश को देखकर भावुक हो सकते हैं। इसी के साथ ऐसा भी माना जाता है कि राख में शरीर के कुछ न कुछ गुण मौजूद रहते हैं। ऐसा सिद्ध भी किया जा चुका है कि अगर आपके पास किसी व्यक्ति का डीएनए मौजूद है और उसके मर जाने के बाद आप उसकी राख का फॉरेंसिक टेस्ट करवाते हैं तो राख का डीएनए मैच हो जाएगा। इसका यही मतलब है कि व्यक्ति के गुण उसकी राख में मौजूद रहते हैं। ऐसे में अगर आप राख को घर में ही रखेंगे तो वो प्राणी आपके आसपास ही हरदम मंडराता रहेगा जिसकी वजह से घर में अशांति भी फैल सकती है। अक्सर तांत्रिक वगेरह राख की मदद से जादू टोना भी करते हैं।

इसीलिए गंगा जी में अस्थियों को प्रवाहित कर देना चाहिए। इससे राख गलत हाथों में नहीं पड़ती है। न ही आपके प्रियजन जादू टोने का शिकार होते हैं। एक तरह से यह फसलों के लिए भी फायदेमंद रहती है। पहले ज्यादातर फसलें नदियों के डेल्टा में ही उगाई जाती थीं, और राख का प्रयोग डेल्टा क्षेत्र में करने से डेल्टा उपजाऊ होती है। खैर राख को गंगा में प्रवाहित करने का अहम कारण यही है कि इससे आपके प्रियजन की राख किसी गलत हाथों में नहीं पड़ती है।

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