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हिंदू धर्म में कोई भी काम रीति रिवाज के बिना सम्पन्न ही नहीं होता है। इंसान जब तक जीवित रहता है तब तक किसी न किसी बंधन में बंधा रहता है और हर काम को रीति रिवाज के अनुसार करता ही रहता है। फिर जब मनुष्य अपना जीवन काल पूरा कर लेता है तो उसकी मृत्यु का समय आ जाता है। फिर एक समय के पश्चात मनुष्य अपने प्राणों को त्याग देता है। ऐसा नहीं है कि जब व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है तो उसके बाद सब कुछ समाप्त हो जाता है। मृत्यु के बाद भी रीति रिवाजों का जो सिलसिला है वो चलता ही रहता है। जब किसी की मृत्यु हो जाती है तो उसके बाद उसके परिजनों की जिम्मेदारियां बढ़ जाती है।

हिंदू धर्म में मृत व्यक्ति के श्राद्ध को किये जाने की परंपरा है। लेकिन श्राद्ध के बारे में बहुत सी चीजें हैं, जिसे बहुत से लोग नहीं जानते हैं। आज हम इसी बारे में आपको बताने जा रहे हैं। आइये जानते हैं श्राद्ध से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण चीज़ें।

◆ क्या होता है श्राद्ध पक्ष?

जो भी हमारे पूर्वज होते हैं, हम उनकी आत्मा की शांति या फिर कह लीजिए तर्पण के लिए निमित्त श्राद्ध करते हैं। श्राद्ध क्या होता है इसके बारे में कोई ठीक से नहीं जानता है। इस पर अलग अलग व्यक्तियों की अलग अलग राय होती है। असल मायने में श्राद्ध का मतलब होता है श्रद्धापूर्वक अपने पितरों के प्रति सम्मान को दर्शना। हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि अपने पितरों को श्राद्ध पक्ष में 15 दिनों तक एक विशेष समय में श्राद्ध या फिर सम्मान दिया जाए। इसी विशेष अवधि को श्राद्ध पक्ष के नाम से जाना जाता है। इसी को कुछ लोग पितृ पक्ष के नाम से भी जानते हैं। पुराणों के अनुसार पितृ पक्ष की अवधि तब शुरू होती है जब कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश होता है। इसी पितृ पक्ष के दौरान जब श्राद्ध किया जाता है तो उसका विशेष महत्व होता है और उसे सर्वोत्तम माना जाता है। इससे पितरों की आत्मा को शांति मिलती है।

◆ श्राद्ध क्यों करना चाहिए?

आज के समय में भले ही लोग इसको अंधविश्वास की संज्ञा दे देते हों लेकिन श्राद्ध का भी एक अलग ही महत्व है। आजकल के जो बच्चे हैं उन्हें अपने माता पिता के नाम याद हो जाएं तो वही बड़ी बात है। कहाँ कोई परदादा और परदादी के नामों को याद रखता है। लेकिन वहीं यदि आप किसी पुराने व्यक्ति से उसके परिवार के बारे में पूछेंगे तो वो आपको अपनी सात पीढ़ी के बारे में बता देगा। भारत में श्राद्ध एक ऐसी व्यवहारिक परंपरा है जो सदियों से चली आ रही है, इसीलिए इसका निर्वहन अवश्य किया जाना चाहिए। अगर हम जानने की कोशिश करें श्राद्ध के बारे में तो हम पाएंगे कि इसका एक उद्देश्य है। श्राद्ध करने के पीछे कारण यह होता है कि जो भी आने वाली पीढ़ी है या जो भी संतति है वो अपने पूर्वजों से परिचित हो सके। श्राद्ध पक्ष के उन 15 दिनों के अंतर्गत परिवार को बनाने वाले या फिर कह लीजिए परिवार रूपी वृक्ष की जड़ को याद किया जाता है और उनकी आत्मा की शांति के लिए प्रयत्न किया जाता है।

◆ श्राद्ध पक्ष में पिंड दान कैसे किया जाता है?

जैसा कि अभी हमने आपको बताया कि जो भी हमारे पूर्वज होते हैं, हम उनकी आत्मा की शांति के लिए ही श्राद्ध करते हैं। इस विशेष काम के लिए आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के समय को निर्धारित किया गया है। इसी समय में कन्या राशि में सूर्य का प्रवेश हो जाता है। यही कारण है कि इसको कहीं कहीं पर ‘कनागत’ के नाम से भी जाना जाता है। अक्सर क्या होता है कि हमें व्यक्ति की मृत्यु की तिथि नहीं मालूम होती है, ऐसी अवस्था में मृत व्यक्ति का श्राद्ध अमावस्या को किया जाना चाहिए। इस तरह के श्राद्ध को ही सर्वपितृ श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। वहीं विवाह जैसे विशेष अवसरों पर भी पूर्व जनों को याद किया जाता है।

◆ श्राद्ध कब किया जाना चाहिए?

हर साल श्राद्ध मनाया जाता है। हर साल श्राद्ध भाद्रपद की पूर्णिमा से शुरू होते हैं और अश्विन मास की अमावस तक मनाए जाते हैं। मान्यता के अनुसार जिस दिन पूर्वज की मृत्यु होती है, उसी दिन उनका श्राद्ध किया जाना चाहिए। ऐसा माना जाता है कि जो पूर्वज होते हैं वो आश्विन कृष्ण पक्ष में 15 दिनों के लिए वापस धरती पर लौटकर आते हैं और जब उनका श्राद्ध किया जाता है तो उनकी आत्मा तृप्त हो जाती है। पितृ पक्ष के दौरान जो श्राद्ध किया जाता है उसे पार्णव श्राद्ध के नाम से जाना जाता है। इसी के साथ यह भी मानना है कि अगर उस समय में पूरे रीति रिवाज के साथ श्राद्ध किया जाता है तो पितृ ऋण से मुक्ति मिल जाती है।

शादी को लेकर भी इसका बहुत अधिक महत्व है। जिस घर में शादी होती है उस घर में पितरों का श्राद्ध निमित्त किया जाना चाहिए। पितरों को जब खुशी के वक़्त याद किया जाता है तो उस समय उनका श्राद्ध भी किया जाना आवश्यक होता है। पितरों के लिए जब कुछ किया जाता है तभी उन्हें खुशी मिलती है। ऐसे में पितरों को खुश करने के लिए आवश्यक है कि उनका श्राद्ध किया जाए। जिस घर में शादी होती है उसमें निमित्त पितरों के लिए भोजन आदि सबसे पहले निकालना चाहिए। फिर इसके बाद जो भी कार्य किये जाते हैं वो सभी सही से संपन्न हो पाते हैं। बहुत लोगों की एक साल तक श्राद्ध  करने की भ्रांति को पंडितों ने दूर कर दिया है। लेकिन खुशी में भी पितरों को कहीं पीछे न छोड़ें और उसी वर्ष उनका श्राद्ध अवश्य करें। श्राद्ध का तो अर्थ ही है सम्मान देना, तो आप जितना अपने पूर्वजों को सम्मान देंगे, उतनी ही आपके घर में खुशियां आएंगी।

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